एक दिवसीय साहित्यिक परिसंवाद सम्पन्न

रवीन्द्रनाथ टैगोर स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कपासन के हिन्दी विभाग द्वारा “हिन्दी साहित्य में स्वातंत्र्य बोध” विषय पर एक दिवसीय साहित्यिक परिसंवाद का सफल आयोजन किया गया। यह परिसंवाद तीन बौद्धिक सत्रों में सम्पन्न हुआ, जिसमें साहित्य, राष्ट्रबोध एवं युवाओं की भूमिका पर गहन विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ माँ शारदे के दीप प्रज्ज्वलन एवं वन्दे मातरम् गान से हुआ। स्वागत उद्बोधन शिवनारायण शर्मा द्वारा प्रस्तुत किया गया।

इस परिसंवाद में लगभग 140 विद्यार्थी, विद्वान एवं शिक्षाविद उपस्थित रहे, जिससे यह कार्यक्रम अत्यंत सफल एवं सार्थक सिद्ध हुआ।

विकसित भारत की संकल्पना में युवाओं की भूमिका

परिसंवाद के मुख्य अतिथि महाविद्यालय प्रबंध निदेशक डॉ. वसीम खान ने अपने उद्बोधन में कहा कि “आजादी का जोश और स्वातंत्र्य बोध ही 2047 के विकसित भारत की संकल्पना को पूर्ण कर सकता है।”
उन्होंने मेट्रो भारत और ग्रामीण भारत के बीच बढ़ते अंतर को पाटने में युवाओं की सक्रिय भागीदारी को अत्यंत आवश्यक बताया।

साहित्यकारों की कलम से जन्मा स्वातंत्र्य बोध

बीज वक्ता डॉ. नवीन नंदवाना (हिन्दी विभागाध्यक्ष, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर) ने 1857 से 1965 तक के साहित्यिक स्वातंत्र्य बोध पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश की आज़ादी में साहित्यकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में लेखकों ने त्याग, संघर्ष और कारावास को स्मरण रखते हुए राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत साहित्य रचा।

1857 के बाद साहित्य में राष्ट्रभावना

द्वितीय सत्र के वक्ता डॉ. राजेन्द्र सिंघवी (सह आचार्य, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, निम्बाहेड़ा) ने कहा कि 1857 की क्रांति के पश्चात भारतीय साहित्य में देशभक्ति की भावना स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई।
उन्होंने यूनेस्को की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए बताया कि भारत एकमात्र ऐसी सभ्यता है जिसके साहित्य में स्वातंत्र्य बोध निरंतर दिखाई देता है।

छायावाद और स्वातंत्र्य चेतना

डॉ. महेश तिवारी (प्राचार्य, राजकीय महाविद्यालय, मावली) ने छायावादी साहित्य में स्वातंत्र्य बोध को “स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह” बताते हुए इसे वर्तमान भारत की विकास यात्रा से जोड़ा और युवाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

राष्ट्रवाद और जागरूक नागरिक की आवश्यकता

समापन सत्र के मुख्य वक्ता डॉ. प्रवीण जोशी (सह आचार्य, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भीलवाड़ा) ने कहा कि वर्तमान समय में जिज्ञासा, सजगता और राष्ट्रचेतना का जागरण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कर्मवीर पत्र और शक्ति पूजा निबंध के उदाहरणों से राष्ट्रवाद के महत्व को रेखांकित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मोनिका जैन एवं दिलशाद बेगम ने किया तथा आभार महाविद्यालय प्राचार्य प्रो. एस. एन. ए. जाफरी ने व्यक्त किया।